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Tuesday, October 31, 2017

MAHA ANNABHISHEKAM 3rdNOVEMBER 2017 FRIDAY


With the blessings of Lord Kamehswarar, Sri Ram Mandir, Sector 7, Dwarka, will be conducting a special function on the occasion of MAHA ANNABHISHEKM on 3rd November 2017, as per the following programme :

3rd November 2017 – Friday (Evening):

5.00PM        Kalasa Sthapanam, Sankalpam
5.15PM        Lagunyasa Ekavaara Rudra Japam/Abhishekam
6.00PM        Anna Abhishekam
6.30PM        Special Alankaram with Annam, Deeparadhanai.
8.00PM        Kalasa Abhishekam after removal of special alankaram
8.30PM        Deeparadhanai and Prasada Viniyogam.

Puja Tariff:
Sankalpam for Rudra Japam / Annabhishekam Rs.250.00

Devotees interested in participating in the above seva, are requested to give details like Gotharam, Nakashatram, Rasi and Name along with the above amount to the Manager, Sri Ram Mandir.

Contributions can be remitted online to The Delhi Bhajana Samaj Sri Ram Mandir Trust Savings Account No : 2948101052633, Canara Bank, CCRT Dwarka, IFSC Code : CNRB0002948, after remitting please send email.

All are requested to attend in large numbers and be recipient of the blessings of Lord Kamehswarar on the above occasion.

LOKA SAMASTHA SUKINO BHAWANTHU

Temple Management Committee

भारतीय अस्मिता की प्रकाशपुंज थीं स्वर्गीय श्रीमती इंदिरा गांधी: दयानंद वत्स

अखिल भारतीय स्वतंत्र पत्रकार एवं लेखक संघ के तत्वावधान में आज संघ के मुख्यालय बरवाला में संघ के राष्ट्रीय महासचिव दयानंद वत्स की अध्यक्षता में पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न स्वर्गीय श्रीमती इंदिरा गांधी की 33वीं पुण्यतिथि पूर्ण सादगी और श्रद्धा से मनाई गई। श्री वत्स ने श्रीमती गांधी के चित्र पर माल्यार्पण कर उन्हें कृतज्ञ राष्ट्र की ओर से अपने श्रद्धा सुमन अर्पित किए। अपने संबोधन में श्री वत्स ने कहा कि इंदिरा गांधी भारतीय अस्मिता की प्रकाश पुंज थीं। मजबूत इरादों की धनी लौह महिला के रुप में उनकी वैश्विक पहचान इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में लिखी गई है। उनके विरोधी भी उनकी मुक्त कंठ से प्रशंसा करते हुए उनको दुर्गा का अवतार तक कहते थे। उन्होनें आजीवन भारत ओर भारतीयों के स्वाभिमान की रक्षा की।

सरदार पटेल की 142वीं जयंती राष्ट्रीय एकता दिवस के रुप में मनाई गई, शिक्षकों और हजारों छात्रों ने ली देश की एकता और अखंडता की रक्षा करने की शपथ।


सर्वोदय बाल विद्यालय प्रहलादपुर बांगर के प्रांगण में आज प्रधानाचार्य श्री वी.के शर्मा की अध्यक्षता एवं गांधीवादी विचारक एवं चिंतक शिक्षाविद् दयानन्द वत्स के सान्निध्य में स्वतंत्र भारत के प्रथम उप-प्रधानमंत्री एवं पहले गृहमंत्री स्वर्गीय सरदार वल्लभ भाई पटेल की 142वीं जयंती राष्ट्रीय एकता दिवस के रूप में मनाई गई। स्कूल के हजारों छात्रों ओर शिक्षकों ने देश की एकता, अखंडता और सुरक्षा की शपथ ली।

इस अवसर पर छात्रों को संबंधित करते हुए शिक्षाविद् दयानंद वत्स ने कहा कि सरदार पटेल का ओजस्वी व्यक्तित्व एवं प्रेरक कृतित्व भारतवासियों के लिए आत्मिक गौरव का विषय है। टुकड़ों में बंटी रियासतों के एकीकरण में सरदार पटेल का योगदान अविस्मरणीय है। प्रधानाचार्य श्री वी. के. शर्मा ने छात्रों से सरदार पटेल द्वारा दिखाए गए मार्ग पर चलने का आह्वान किया। इस अवसर पर राजकीय विद्यालय शिक्षक संघ, जिला उत्तर पश्चिम के सचिव श्री विक्रम देसवाल भी उपस्थित थे।

DEHRADUN FOOTBALL ACADEMY PARTICIPATING - STATE CHAMPIONSHIP 2017


DEHRADUN FOOTBALL ACADEMY SENIOR TEAM TODAY ANNOUNCED - FOR LATE SUDHANSHU MANDAL MEMORIAL STATE FOOTBALL INVITATIONAL CHAMPIONSHIP 2017 IN RUDRAPUR, DINESH PUR , UTTARAKHAND

TOURNAMENT STARTED FROM 22 NOVEMBER TO 9TH DECEMBER 2017
ORGANIZER - PAVITER YOUNG CLUB, DINESHPUR, HIMANSHU SARKAR
15 DAYS FOOTBALL CAMP COMPLETED
35 PLAYERS HAS BEEN PARTICIPATED IN THE CAMP AND SELECTED 16 PLAYERS
SELECTOR - DILABAR SINGH BISHT, JAGMOHAN SINGH RAWAT, MITRA NAND NAUTIYAL, V.S.RAWAT
TEAM ARE
COACH- PRAKASH MALL, MANAGER - AKASH BHANDARI, ASHISH BHANDARI- CAPTAIN, AKSHAY THAPA - VICE CAPTAIN, ASHISH RAWAT, SIDDHARTH RAWAT, PRAVEEN RAWAT, RAJEEV KUMAR, VIKAS THAPA, AMAN JAKHMOLA, PRADEEP NEGI, ROSHAN , AKSHAY, ABHISHEK, HIMANSHU RAWAT,  RAUNAK RAI

DFA FOUNDER PRESIDENT AND HEAD COACH - VIRENDRA SINGH RAWAT GIVEN
BEST WISHES - DFA TEAM CONTINUE 7 TOURNAMENT OTHER DISTRICT STATE LEVEL AND ALL INDIA LEVEL
RECENTLY WON STATE CHAMPIONSHIP IN KASHIPUR IN NOVEMBER

Educating the future society…………



Rashmi Malik
Principal
Delhi International School
Sector-23, Dwarka, Delhi

Life is an unending learning journey, since our birth to the end (may be beyond) we keep learning. From the ancient times to the modern era people have been trying to find “Systems” of right education to create better society. Being in education for almost 20 years now ,I am often asked about my take on today’s education system by parents, students and the people who are associated with the education world. Over so many years meeting so many people , educating thousands of students and doing a balancing act between the Indian and International trends I have found out that everything comes down to a simple formula which is to keep your roots firmly grounded in Ancient Indian system and extend the branches in the world. 

I am sharing the base line of my thoughts on education system here today (Influenced by many reformers and my own experience) :

“The Education system is a dynamic field (Yes it cannot be static version used for years) as it deals with different individuals every moment. Every moment in class rooms new things are happening depending upon the situation and the energy of the students available.

In broader form there are 5 dimensions of education for a learner especially in schools:

The First dimension is Informative and Languages. Informative areas like geography, History etc which can be taught positively by focussing on the inspirational episodes from History and making kids aquainted to geography so as to make them comfortable about all the parts of earth. The language is necessary for communication, the child must learn the pure form of mother tongue as well as an international language like English to sail through this world.

The Second dimension is of inquiry of scientific subjects, which is tremendously important for analytical skills.

The Third dimension is art of living which includes sense of humour , laughter and sensitivity to the nature around. Imagine the world without laughter and love, how sad and grim it would be. So the child must be attuned to nature and helped to learn how to transform hate, anger and jealousy into love. Then only all other material achievement will make sense else all the efforts will go waste.

The Fourth dimension is of art and creativity. Painting , Music, Craftsmanship, pottery etc. Immersing in which the child learns to improve concentration, self esteem, happiness and release of negativity.

The Fifth dimension surprising for all is about life and death, through the examples of daily life, the nature ,the people , everything around which is having a cycle of birth and death. This knowledge keeps the child rooted forever."

If all of the above dimensions are basis for whatever “system” we create in our institution we can think of the holistic development of our kids.

At DIS these five dimensions are being taken care by various methods and International ways. Till date the achievements have been tremendous but as I said earlier education is dynamic hence the methodology keeps improving from time to time and person to person.

Happy educating !!

Monday, October 30, 2017

सतर्कता जागरूकता सप्ताह के अवसर पर सर्वोदय बाल विद्यालय प्रहलादपुर बांगर के शिक्षकों ओर छात्रों ने ली भ्रष्टाचार मुक्त भारत के निर्माण के लिए ईमानदारी से काम करने की शपथ।


सर्वोदय बाल विद्यालय प्रहलादपुर बांगर के प्रांगण में आज प्रधानाचार्य श्री वी.के शर्मा की अध्यक्षता में शिक्षाविद् दयानंद वत्स ने सतर्कता जागरूकता सप्ताह के अवसर पर स्कूल के छात्रों और शिक्षकों को ईमानदारी से कार्य करने की शपथ दिलाई। इस अवसर कर अपने संबोधन में श्री वत्स ने कहा कि ईमानदारी से अपना काम करने वाले लोग रात को चैन की नींद सोते हैं। उन्हें निष्ठापूर्वक, निस्वार्थ भाव से काम करने से आत्मिक संतोष भी मिलता है। जीवन में ईमानदारी और सच्चाई के मार्ग पर चलकर ही व्यक्ति महान बनता है। इसलिए 125 करोड भारतवासियों का एक ही लक्ष्य भ्रष्टाचार मुक्त भारत हो। 

प्रधानाचार्य श्री वी. के.शर्मा ने इस अवसर पर छात्रों और शिक्षकों को संबोधित करते हुए कहा कि परिश्रम ओर ईमानदारी का अन्य कोई विकल्प नहीं होता इसलिये सदैव ईमानदारी के रास्ते पर ही चलना चाहिए। इस मौके पर ना किसी को रिश्वत देंगे और ना ही किसी से रिश्वत लेंगे का भी संकल्प लिया

Sunday, October 29, 2017

भारतीयता की उत्प्रेरक थी भगिनी निवेदिता : दयानंद वत्स

अखिल भारतीय स्वतंत्र पत्रकार एवं लेखक संघ एवं नेशनल चाइल्ड एंड वूमन डवलपमेंट चेरिटेबल ट्रस्ट के तत्वावधान में आज उत्तर पश्चिम दिल्ली स्थित संघ के मुख्यालय बरवाला में संघ के राष्ट्रीय महासचिव गांधीवादी विचारक एवं चिंतक दयानंद वत्स की अध्यक्षता में भारतीय संस्कृति की ध्वजवाहिका भगिनी निवेदिता की 150 वीं जयंती सांस्कृतिक समरसता दिवस के रुप में सादगी और श्रद्धा से मनाई गई। श्री वत्स ने भगिनी निवेदिता के चित्र पर माल्यार्पण कर.उन्हें कृतज्ञ राष्ट्र की ओर से अपनी भावभीनी श्रृद्धांजलि अर्पित की। अपने संबोधन में श्री दयानंद वत्स ने कहा कि आयरिश मूल की मारग्रेट एलिजाबेथ नोबल स्वामी विवेकानंद के व्यक्तित्व एवं कृतित्व से इतनी प्रभावित हुई कि वे भारत आ गयी ओर फिर कभी स्वदेश नहीं लोटी। भारतीय सभ्यता और संस्कृति में रची बसी एलिजाबेथ को स्वामी विवेकानंद ने अपनी शिष्या बना लिया ओर उन्हें भगिनी निवेदिता नाम दिया। स्वामी रामकृष्ण परमहंस की पत्नी शारदा ने उन्हें बेटी कहा और मारग्रेट सदा सदा के लिए भारत की बेटी बन गई। उन्होंने स्त्री शिक्षा के प्रति लोगों को जागरूक ओर प्रेरित किया।

अपनी लिखी अनेकों पुस्तकों में भगिनी. निवेदिता ने भारतीय सभ्यता और संस्कृति को विश्व में सर्वोपरि माना। एक शिक्षिका और समाज सेविका के रुप में भी उनका योगदान अविस्मरणीय है। कलकत्ता में जब प्लेग फैला उस समय भगिनी निवेदिता ने वहां रहकर प्लेग पीडितों की खूब सेवा की। भगिनी का अर्थ बहन ओर सिस्टर निवेदिता के नाम से वे प्रसिद्ध हुई। भगिनी निवेदिता मानवीय मूल्यों की पक्षधर थीं। वह पश्चिम की प्रथम महिला थीं जिसने भारत को अपनी कर्मभूमि बनाया और भारतीय संस्कृति की ध्वजवाहिका के रुप में कीर्तिमान स्थापित किए।

10th Global Film Festival Noida


Friday, October 27, 2017

सच्चे सौदे का पूरा सच्च !

आर. डी. भारद्वाज "नूरपुरी "

सब स्थानों के बच्चों को बचपन में अच्छी २ और शिक्षा देने वाली और उनके जीवन को सँवारने वाले किस्से / कहानियाँ पढ़ाई और सुनाई जाती है, उस स्थान के गुरुओं और पीर पैगंबरों की कहानियाँ इत्यादि ताकि बच्चे उन महापुरुषों के जीवन से अच्छी बातें सीख सकें और अपना जीवन बेहतर बनाएँ | ऐसी ही एक कहानी हमने अपने बचपन में अनेकों बार पढ़ी और सुनी हुई है, लेकिन आज मैं फ़िर से इसको दुहराह रहा हूँ, कारण इस कहानी के बारे में एक बात जो ना तो कभी पाठशालों में पढ़ाई गई और ना ही कभी गुरुद्वारों में हमें सुनने को मिलती है |
सिख धर्म के गुरुओं में श्री गुरु नानक देव जी का नाम सबसे पहले आता है, उनका जन्म राय भोए की तलवंडी में 1469 ई. में मेहता कालू जी के घर हुआ था | उनकी माता जी का नाम तृप्ता जी था । बचपन से ही आप बड़े शाँत स्वभाव वाले थे और आपका रुझान भगवान की ओर आम बच्चों से कुच्छ ज़्यादा ही था | छोटी उम्र में ही वह कभी २ बहुत बड़ी २ बातें कर जाते थे जोकि सुनने वाले बड़े आदमियों को भी सोच में डाल देती थीं | उनके जीवन से जुड़ी ऐसी बहुत सी घटनाएँ के बारे में विभिन्न जन्म साखियों में विस्तार से वर्णन पढ़ने को मिलता है।


नानक देव जी जब सात आठ वर्ष के हुए तो पढ़ने लिखने लिए उनको गाँव के पण्डित जी के पास भेजा गया | उस वक़्त हिन्दु धर्म में प्रचलित एक रसम को निभाने के लिए पंडित जी ने सबसे पहले उनके गले में जनेऊ डालने की रस्म पूरी करनी चाही | इसी सन्दर्भ में बालक के गले में एक जनेऊ डालने की जब चेष्टा की, तो बालक नानक देव ने पंडित से पूछा कि यह जनेऊ डालने से क्या लाभ होगा? पंडित जी ने उत्तर दिया कि यह जनेऊ दुःख सुख में, मुसीबत या परेशनियों के समय आपकी रक्षा करेगा | तब बालक नानक देव जी ने पण्डित जी से फ़िर एक सवाल पूछा कि यह जनेऊ जोकि खुद्द सूत के धागों का बना हुआ है, यह जब खुद्द ही वक़्त बीतने पर मैला कुचेला हो जाएगा, गल सड़ जायेगा, तो यह मेरी रक्षा कैसे करेगा? पंडित जी सवाल सुनकर आश्चर्यचकित तो अवश्य हो गए, क्योंकि उनके पास बच्चे के सवाल का कोई जवाब नहीं था | उल्टा उसने बालक नानक देव से ही पूछ लिया कि चलो आप ही बता दो कि हमें कैसा जनेऊ डालना चाहिए? तो नानक देव जी ने उनको कहा कि मुझे ऐसा जनेऊ पहनाया जाए जो न तो कभी टूट सके, न ही गंदा हो सके, न ही उसे पानी गीला कर सके और न ही अग्नि उसे जला सके। पण्डित जी ने फ़िर पूछा कि ऐसा जनेऊ मिलेगा कहाँ ? तब बालक नानक देव ने उन्हें विस्तार से समझाते हुए उत्तर दिया : -

‘‘दया कपाह संतोख सूत, जत गंढी सत वट॥ इह जनेऊ जीय का, हई त पांडे घत ॥
न इह तुटै न मल लगै, न इह जलै न जाए॥ धन सु माणस नानका, जो गल चल्ले पाए ॥’’

जैसे २ कुच्छ और वर्ष बीत गए, नानक देव जी 19-20 वर्ष के हो गए, उनके पिता जी ने उनको किसी न किसी काम धंधे में लगाने की कोशिश की, कि किसी तरह उनका बेटा अपनी रोजी रोटी कमाने लायक बन जाये, लेकिन नानक देव जी का किसी काम में दिल लगता ही नहीं था, वह तो अपना ज़्यादा समय भगवान को याद करने और सिमरन करने में ही लगाया करते थे | इसी बीच मेहता कालू को ध्यान आया - क्यों ना बेटे को कुच्छ पैसे देकर शहर भेजा जाए और उसे कोई ठंग का कारोबार करने के लिए प्रेरित किया जाए | यही सोचकर उन्होंने नानक देव जी को 20 रुपए देकर कुच्छ बढ़िया सामान लाने के लिए शहर भेजा, ताकि उसे बेचकर कुच्छ और पैसे कमाए जा सकें| क्योंकि उस वक़्त के हिसाब से बीस रूपये एक बड़ी रकम थी, मेहता कालू जी ने नानक देव जी के संग उनके एक मित्र भाई मरदाना, जोकि उसी गॉँव का रहने वाला था, उसे भी साथ भेज दिया, और दोनों को समझाया कि कोई ख़रा / बढ़िया / पाक-साफ़ / सच्चा सौदा ही करना है |

अपने गाँव तलवंडी से चलकर नानक देव जी और उनके मित्र जब चूहड़काने पहुँचे, तब सतगुर, गुरु रविदास जी अपने कुच्छ और साथी साधु संतों (संत कबीर जी, नामदेव जी, तरलोचन जी, सदना जी और सेन जी) के संग अपनी जन कल्याण यात्रा पर निकले हुए थे | यह सब साधु संत महात्मा जगह २, गाँव-2 घूमकर लोगों को प्रमात्मा के बारे में समझाते, अध्यात्मवाद पर प्रवचन करते और जातपात न मानने के लिए लोगों को प्रेरित करते और उनको ब्रह्मज्ञान की बहुमूल्य दात / शिक्षा देते | गुरु रविदास जी नानक देव जी से लगभग 32 / 33 वर्ष बड़े थे और अपने ज़माने के सबसे बड़े ब्रह्मज्ञानी गुरु थे, और वह लोगों को रूढ़िवादी / अज्ञानतापूर्ण और तरह २ के भ्रमजाल से लोगों को निकालकर अध्यात्मवाद से जोड़ते हुए एक सच्चे भगवान की भक्ति करने के लिए प्रेरित किया करते थे | नानक देव जी, जिनको कि बचपन से ही प्रमात्मा से इतना लगाव था और अक्सर अपना ज़्यदातर समय प्रभु सिमरन में ही लगाया करते थे, उनको अचानक गुरु रविदास जी की जब संगत करने का सुनहरी अवसर प्राप्त हुआ, तो उनको ऐसा अनुभव हुआ कि जैसे किसी प्यासे इन्सान को कोई मीठा-निर्मल और तनमन को शीतलता प्रदान करने वाला अमृत जी भरकर पीने को मिल गया हो | गुरु रविदास जी के वचन / प्रवचन उनको बहुत बढ़िया और मन को शान्ति और सकून प्रदान करने वाले अनुभव हुए | नानक देव जी उनके प्रवचनों से इतने प्रसन्न और प्रभावित हुए कि वह उनके लिए कुच्छ भी करने को तैयार हो गए | सत्संग हो चूका था, तो बस इसके बाद लंगर करवाने की इच्छा में नानक देव जी ने अपने दोस्त के साथ मिलकर झटपट लंगर के लिए राशन खरीदा और उस गाँव के सत्संग में शामिल सेवादारों की मदद से लंगर तैयार करवाया और सब साधु संतो के साथ २ सतसंग सुनने आए सब लोगों को लंगर शाकवा दिया | यह सब कार्य करते समय उनको यह भी याद था कि घर से चलते समय उनके पिता जी कहा था कि कोई ख़रा सौदा ही करना, फिर उन महान गुरुओं को भोजन करवाना, जिन्होंने आपको अध्यात्मवाद / प्रभु भक्ति का सही २ रास्ता दर्शाया हो, पाखंडवाद और असलियत में, रूढ़िवादी विचारों और तर्कशीलता में, सच और झूठ में अन्तर इतनी बारीकी से समझाया हो, नानक देव जी को महसूस हुआ कि इससे बढ़कर ख़रा / सच्चा सौदा और क्या हो सकता था ? 

सत्संग सुनकर, प्रभु चर्चा में शामिल होकर और गुरु रविदास जी व उनके साथी साधु संतों को भोजन करवाकर नानक देव जी के मन को बड़ी तृप्ति हुई और उनकी रूह को बड़ी शाँति अनुभव हुई | इसके बाद उन्होंने और उनके मित्र मरदाना ने गुरु रविदास जी के चर्ण स्पर्श किए और उनका आशीर्वाद लेकर चूहड़काने से अपने गाँव तलवंडी के लिए रवाना हो गए| जब नानक देव जी घर पहुँचे और अपने द्वारा किये गए सच्चे सौदे की उनको जानकारी दी, तो उनके पिता जी ने उनको बहुत डांट फटकार लगाई, क्योंकि उनको लगा की नानक देव ने बीस रूपये की बड़ी रकम यूँ ही गँवा दी है, परन्तु नानक देव जी की बहन बीबी नानकी जी ने अपने पिता जी को समझाया कि उसका भाई कोई साधारण पुरुष नहीं, बल्कि भगवान ने उन्हें किसी विशेष कार्य के लिए ही इस धरती पर भेजा है और वह इसी दिशा में कार्य कर रहा है|

लेकिन यह भी एक गम्भीर सोच विचार का मुद्दा है कि नानक देव जी द्वारा किया गया यह सौदा या फ़िर हम इससे हम तन, मन और धन की एक सच्ची सेवा भी कह सकते हैं, इसका वर्णन हमारी धर्म की पुस्तिकों में अधूरा क्यों है? और न ही नानक देव जी कोई ऐसे बिलकुल ही अनाड़ी किस्म के इन्सान थे जोकि किसी निहायत ही सादारण से प्रतीत होने वाले किसी साधु पर बीस रूपये की बड़ी धन राशि ऐसे ही लुटा दें? इसका एक सीधा सा उत्तर जो समझ आता है वह यह है कि सतगुरु रविदास जी द्वारा नानक देव जी को दी गई शिक्षा या ब्रह्मज्ञान, जिसे कि तथाकथित ऊँची जाति के लोग मानने को तैयार नहीं हैं | हमारे देश में जातिप्रथा का कलंक तो पिछले दस हज़ार वर्षों से चला आ रहा है, समय २ पर ना जाने कितने ही गुरुओं / ऋषियों / मुनियों और पीर पैगंबरों ने आम जनता को इस गलत और जातिगत सोच को बदलने की हज़ारों बार कोशिश भी की, सब को बार - २ यह बात समझाने का पूरा २ प्रयास किया कि सभी इन्सान निरंकार / प्रमात्मा ने एक ही मिट्टी से बनाए हैं, सभी इन्सान वही पाँच तत्वों {हवा, पानी, मिट्टी, अग्नि और आकाश (आत्मा) } के पुतले हैं, और सब में उस एक ही निरंकार / प्रमात्मा की ज्योत (जिसे हम आत्मा कहते हैं) जलती है, न तो प्रमात्मा ने कोई जातपात बनाई हैं और न ही धर्म व मज़हब बनाए हैं, निरंकार ने तो केवल इन्सान ही बनाए हैं और उसने इन्सान बनाते समय किसी किस्म का कोई भेदभाव नहीं किया है, ऐसा एक इन्सान से दूसरे इन्सानों में भेदभाव पैदा करने वाले काम तो कुच्छ शातिर लोगों ने अपने निजी स्वार्थ को ध्यान में रखते हुए ही किए हैं, और यह भी एक बहुत बड़ी विडम्बना है कि ऐसी रूढ़िवादी सोच को समाज वाले लोग अपनी सुविधा अनुसार सच मानने लग गए और यही धीरे २ यह हमारी समाज में मान्यताएँ बनती चली गई| गुरबाणी में भी एक शब्द आता है - "अव्वल अल्लाह नूर उपाया, कुदरत दे सब बन्दे / एक नूर से सब जग उपजिया / कौण भले कौण मंदे ------------" अवतार बाणी में भी एक शब्द आता है - "इक्को नूर है सबदे अंदर / नर है चाहे नारी है / ब्राह्मण , खत्री , वैश्य , हरिजन, इक्क दी ख़लकत सारी है ----------- "

गुरु नानक देव जी की गुरु रविदास जी से मुलाकत और उनसे ब्रह्मज्ञान लेने की घटना का जिक्र आता है कुच्छ लोग अपना तकियानूसी या अल्प बुद्धि तर्क देते हैं कि अगर रविदास जी वाक़्या ही इतने बड़े सतगुरु थे, तो वह अपने लिए और अपने बाकी साथी साधु संतों के लिए भोजन की व्यवस्था क्यों नहीं कर सके? इसका सीधा सा उत्तर यह है कि जब उनकी मुलाकात नानक देव जी से हुई, तब रविदास जी चूहड़काने में अपनी जन कल्याण यात्रा पर थे | महान सतगुरु जगह २ घूम २ कर प्रमात्मा का सन्देश आम जन मानस तक पहुँचाने हेतु, उनको बेहिसाब फैले हुए भ्रमजाल के अंधकार से निकालकर ज्ञान के उजाले में लाकर उनको प्रभु भक्ति से जोड़ने के लिए गुरु गाँव - २ जाया करते थे, उस वक़्त गुरु रविदास जी भी एक ऐसी ही कल्याण यात्रा पर थे | नानक देव जी भी जब गुरु बने, तब उन्होंने भी अपने जीवन काल में चारों दिशाओं में चार बड़ी २ कल्याण यात्राएं की जिनको बाद में इतिहासकारों ने "उदासियाँ " का नाम दिया है| जब गुरु जन कल्याण यात्रा पर होते थे, तब वह अपने श्रद्धालुओं द्वारा ही परोसे गए भोजन ही किया करते थे | जिस गाँव में अपने प्रवचन करने के लिए डेरा लगाना, वहीं पर भोजन ग्रहण कर लेना | और किसी सज्जण का यह बात कहना कि मैंने अपने गुरु को भोजन करवाया है, यह तो बहुत निम्नकोटि की सोच का परिचय देती है | हमेशा याद रखो ! गुरु जिस भी श्रद्धालु की सच्चे मन की लगन से प्रसन्न होता है, वह उसी पर दयालु / कृपालु होकर उसे सेवा का अवसर देता है | यह सेवा कई प्रकार की हो सकती है - तन की, मन की या फ़िर धन की | भोजन करवाना भी एक तरह की सेवा ही है, जोकि गुरु रविदास जी ने उस वक़्त नानक देव जी को इसलिए बख्शी, क्योंकि उन्होंने नानक देव जी को देखकर पहली नज़र में ही भाँप लिया कि यह इन्सान तन और मन से बिलकुल पवित्र है और यह अध्यात्मवाद / भगवान की ख़ोज में बहुत आगे तक जाने की प्रबल इच्छा शक्ति व श्रद्धा रखता है | गुरु रविदास जी को नानक देव जी में यह गुण / लक्षण प्रथम दृष्टि में ही नज़र आ गए थे | इसी लड़ी में गुरु रविदास जी ने नानक देव जी को, उनके अन्दर प्रमात्मा को जानने और पाने की इतनी ज़्यादा कशिश / तड़प / प्यास देखी कि चूहड़काने में एक ऐसा ही सेवा का अवसर उन्होंने नानक देव जी को दिया और उनका प्रभु भक्ति की ओर रास्ता और सुदृढ़ और स्पष्ट कर दिया | मग़र, इस पूरे सन्दर्भ का मतलब यह हरगिज नहीं निकाल लेना चाहिए कि गुरु रविदास जी भूखे थे, गुरु तो सबका दाता होता है, पालनहार होता है, दुनियाँ की कोई भी सौगात उनसे छिपी हुई नहीं होती, और वह तन मन से पूर्ण रूप में संतुष्ट होते हैं, यह दुनियावी सौगातें तो उनके चरणों के नीचे होती है, क्योंकि वह तो खुद वक़्त का पैग़म्बर होता है, और दुनियाँ के दुःख तकलीफ़ कष्ट दूर करने के लिए ही वह धरती पर अवतार लेते हैं | निरंकार प्रमात्मा का ही साकार रूप होता है सतगुरु और धर्म की स्थापना और आम जन-मानस कल्याण हेतु वह हमेशा प्रयत्नशील रहते हैं ! 

ऐसी और भी बहुत सी उदहारण दी सकती हैं, लेकिन इतने हज़ार वर्ष बीत जाने के बाद भी अभी भी करोड़ों लोग ऐसे हैं, जिनको यह बात समझ नहीं आई है और वह इस सच्चाई को समझने और तनमन से मानने को तैयार नहीं हैं | जातपात की धूल उनके मन और मस्तिष्क पर बड़ी बुरी तरह चिपकी हुई है, इस काल्पनिक मिथिक की वजह से समाज में फ़ैली हुई इतनी व्यापक आर्थिक ऊँच-नीच , बड़ी २ जमीन जायदादों और कारोबारों का अधिपत्य / नेतृत्व / संकुल या फ़िर लोगों के पूर्वगृह भी हो सकते हैं, लेकिन यह सब मानव रचित खेल ही हैं, निरंकार ने हरगिज़ नहीं बनाए ; नतीजा यह है कि वह अभी भी अपनी भेदभाव वाली सोच और मानसिकता छोड़ने को तैयार नहीं हैं | अगर कोई अकेला दोकेला छोड़ने को तैयार भी हो जाए , तो धर्म के ठेकेदार बीच में अपनी छुआछूत वाली मानसिकता के चलते ऐसा होने नहीं देते और यह भी उसी घटिया और गिरवाट लाने वाली सोच के ही परिणाम है कि तथाकथित ऊँची जातियों के लोग इतिहास के किसी भी दौर में किसी निचली जाति के इन्सान ने जब भी कोई बड़ा कार्य किया हो, समाज के तथाकथित ऊँची जातियों के लोगों ने कभी उस बड़े इन्सान को इसका श्रेय नहीं दिया है, उसकी प्रशंसा नहीं की है और न ही उसका बनता मान सम्मान ही दिया है | बड़े २ कार्यों को मानने और वह कार्य करने वालों को श्रेय देने का उनका हमेशा एक ही पैमाना रहा है - और वह है कि क्या यह कार्य करने वाला किसी ऊँची जाति का है या फ़िर किसी नीची जाती का ! अगर कोई बड़ा कार्य करने वाला कोई इन्सान नीची जाति से सम्बंधित है तो ऊँची जातियों के लोग किसी न किसी और बेहूदा और षड्यंत्रकारी तर्क वितर्क करते हुए उसे नकारने लग जाते हैं और उनसे बड़े इन्सान को हमेशा छोटा करके दिखाने की ही चेष्टा की जाती है | यहाँ तक कि दलितों के महान विद्वानों, ऋषियों / मुनियों के साथ भी उनका यही दुर-व्यवहार देखने को मिलता है| इसी सोच के चलते हुए उन्होंने कभी गुरु रविदास को गुरु नहीं माना, हमेशा उनको भक्त रविदास बोलकर या लिखकर हमेशा उनका निरादर करते रहे हैं, डॉ अम्बेडकर जैसे महान विद्वान, समाज सुधरक, अर्थशास्त्री और हमारे देश के संविधान निर्माता को उन्होंने कभी उनका बनता स्थान व दर्जा नहीं दिया, इसी सन्दर्भ में - महान विद्वानव समाज सुधारक, महात्मा ज्योतिबा फुले और उनकी पत्नी सावित्रीबाई फुले की मिसाल भी दी जा सकती है | रही बात गुरु रविदास जी की, यह बात भी जगज़ाहिर है कि चौहदवीं शताब्दी की राजपूत रानी मीराबाई भी गुरु रविदास जी की ही भक्त थी, और उसको भी गुरु रविदास जी से ही ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति हुई थी, लेकिन ऊँची जाती वालों को यह बात भी स्वीकार करने में हमेशा मानसिक दिक्कत महसूस होती रही है | 

यहाँ पर एक और बात का जिक्र करना अनिवार्य हो जाता है जोकि हमारे महान गुरुओं / पीर-पैगंबरों ने हमें अनेकों बार समझाने को कोशिश की है कि भगवान के दो रूप होते हैं - एक निराकार और दूसरा साकार ! जब २ भी इस पृथ्वि पर धर्म की हानि होती है और पाप कर्म बहुत ज़्यादा बढ़ जाते हैं तो भगवान स्वमं इन्सान के रूप में जन्म लेते हैं और यह उनका साकार रूप होता है | साकार रूप में प्रकट होकर ऐसे महान गुरु लोगों को रूढ़िवादी सोच विचारों और भ्रमों से छुटकारा दिलवाते हैं, पापों का नाश करते हैं और ऐसे धीरे - २ धर्म की पुण्य स्थापना करते आए हैं | भगवान राम, श्री कृष्ण, महात्मा बुद्ध, गुरु रविदास और गुरु नानक देव जी ने भी अपने २ समय में आम जन मानस को समझाने के लिए हज़ारों यत्न किये और करोड़ों लोगों को अज्ञानता के अन्धकार से बाहर निकाला और मानवता का कल्याण किया | दूसरी बात - ब्रह्मज्ञान एक ऐसी दुर्लभ / अमोलक वास्तु है जोकि केवल और केवल निरंकार या भगवान जब साकार रूप में प्रकट होते हैं, तबी वह योग्य व्यक्तियों को प्रदान करते हैं | मीरा ने जब जन्म लिया था, तब श्री कृष्ण तो साकार रूप में थे ही नहीं, वह तो मीरा से लगभग साढ़े तीन हज़ार वर्ष पहले ही ब्रह्मलीन हो चुके थे, अत: यह बात कहना कि मीरा ने श्री कृष्ण से ब्रह्मज्ञान प्राप्त किया था, इस बात में कोई सच्चाई नहीं है ! 

गुरु रविदास जी को गुरु न मानने का प्रसंग मीरा से जुड़ी एक और बड़ी घटना में भी आता है | मीराबाई का जन्म राजस्थान के मेड़ता में सन 1498 में, एक राजपरिवार में हुआ और उनके पिता रतन सिंह राठोड़ एक छोटे से राजपूत रियासत के शासक थे। वे अपनी माता-पिता की इकलौती संतान थीं और जब वे छोटी बच्ची थीं तभी उनकी माता का निधन हो गया था। मीरा का विवाह राणा सांगा के पुत्र और मेवाड़ के राजकुमार भोज राज के साथ सन 1516 में संपन्न हुआ। उनके पति भोज राज दिल्ली सल्तनत के शासकों के साथ एक संघर्ष में सन 1518 में घायल हो गए और इसी कारण सन 1521 में युवा अवस्था में ही उनकी मृत्यु हो गई । इतिहास में इस बात का भी प्रमाण मिलता है कि उस समय की प्रचलित एक प्रथा के अनुसार पति की मृत्यु के बाद मीरा को उनके पति के साथ सती करने का प्रयास भी किया गया, किन्तु इसके लिए मीरा ने स्पष्ट लफ्जों में मना कर दिया | क्योंकि मीरा के मना करने के बाद उसके सके सम्बन्धी व रिश्तेदार उसकी हत्या करवाने की फ़िराक में थे, इसलिए वह अपने घर से भाग गई और धीरे-धीरे वे संसार से विरक्त हो गई और साधु-संतों की संगति में कीर्तन करते हुए अपना समय व्यतीत करने लगीं | लेकिन उनके अंतर्मन की प्यास - सच्ची भक्ति और ब्रह्मज्ञान और भगवान की प्राप्ति नहीं बुझ पा रही थी | ऐसे ही जब इधर उधर घूमते २ किसी साधु ने उसे इतनी शिद्दित से प्रमात्मा की ख़ोज में उनका ध्यान पाया तो उसने मीरा को सुझाव दिया कि बनारस में एक सत्तगुरु है, जो उसके प्यासे मन की तृष्णा को शाँत कर सकता है, और वह है गुरु रविदास जी | तो अपने भगवान प्राप्ति के लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए तब मीरा सतगुरु रविदास जी की शर्ण में आई । गुरु रविदास जी ने उसकी भौतिक / सांसारिक वस्तुओं का त्याग और प्रभु भक्ति की इतनी तीव्र तड़प / प्यास देखकर उनको ब्रह्मज्ञान की दौलत से मालामाल करवाया और अध्यात्मवाद / भक्ति में उनको रास्ता साफ़ -२ दिखलाया | और जब मीरा को एक सच्चा गुरु मिल गया और उससे उसको ब्रह्मज्ञान की बेशकीमती दौलत की प्राप्ति हो गई , तब मीरा का बुझा-२ सा और सांसारिक दुःख तकलीफों का मारा हुआ मन भी पुल्कित हो उठा और वह प्रसन्नता से झूम-२ कर नाचने गाने लग गई - "पाइओ जी मैंने राम रतन धन पाइओ / वस्तु अमोलक दी मेरे सतगुर, किरपा कर अपनायो / पाइओ जी मैंने राम रतन धन पाइओ !!" 

लेकिन उनके ससुराल पक्ष और बाकी ऊँची जातियों के समाज ने मीरा द्वारा रविदास जी अपना गुरु बनाना राजघराने की मर्यादा के अनुकूल नहीं माना और समय-समय पर उस पर अत्याचार करते ही रहे । यही नहीं, उसके परिवार वालों को एक राजपूत राणी का गुरु रविदास से ब्रह्मज्ञान लेने की बात उस वक़्त की प्रचलित अन्धविश्वास और जातिप्रथा के अनुकूल न मानते हुए वह हमेशा इस बात से इन्कार ही करते रहे कि मीरा ने रविदास जी को अपना गुरु बनाया है और उसे ब्रह्मज्ञान भी प्राप्त किया है | मीरा अपनी जीवन यात्रा समाप्त करके सन 1560 में मृत्युलोक चली गई |

Thursday, October 26, 2017

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी से ठुमरी साम्राज्ञी पद्म विभूषण स्वर्गीया गिरिजादेवी को मरणोपरांत भारत रत्न से सम्मानित करने की मांग : दयानन्द वत्स

नेशनल मीडिया नेटवर्क के राष्ट्रीय अध्यक्ष गांधीवादी विचारक एवं चिंतक दयानन्द वत्स ने आज नई दिल्ली में प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी से मांग की है कि ठुमरी साम्राज्ञी पद्म विभूषण दिवंगत गिरिजादेवी को मरणोपरांत पारंपरिक हिंदुस्तानी शास्त्रीय गीत और संगीत को वैश्विक पहचान दिलाने के लिए भारत रत्न से सम्मानित किया जाए। श्री वत्स ने आज स्वर्गीय गिरिजादेवी के शरीर को बनारस में पंचतत्व में विलीन किए जाने पर उन्हें कृतज्ञ राष्ट्र की ओर से अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की। श्री वत्स.ने कहा कि गिरिजादेवी का निधन हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत जगत के लिए अपूरणीय क्षति है। अत: उनकी स्मृतियों को अक्षुण्ण रखने के लिए सम्मान स्वरुप भारत रत्न अवश्य ही दिया जाना चाहिए।

Chhath Puja celebrations in Dwarka






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पत्रकारिता के भीष्म पितामह निर्भीक कलम के सिपाही थे गणेश शंकर विद्यार्थी: दयानंद वत्स

अखिल भारतीय स्वतंत्र पत्रकार एवं लेखक संघ के तत्वावधान में आज संघ के मुख्यालय बरवाला में संघ के राष्ट्रीय महासचिव दयानंद वत्स की अध्यक्षता में पत्रकार, समाजसेवी और स्वतंत्रता सेनानी स्वर्गीय श्री गणेश शंकर विद्यार्थी की 127वीं जयंती सादगी और श्रद्धा पूर्वक मनाई गई। श्री वत्स ने श्री गणेश शंकर विद्यार्थी के चित्र पर माल्यार्पण कर उन्हें कृतज्ञ राष्ट्र की और से अपने श्रद्धा सुमन अर्पित किए। अपने संबोधन में श्री दयानंद वत्स ने कहा कि स्वर्गीय गणेश शंकर विद्यार्थी पत्रकारिता के भीष्म पितामह और निर्भीक कलम के सिपाही थे। उनकी लेखनी ने अंग्रेजी शासन की नींव हिलाकर रख दी थी। उनके लेखों और निबंधों में भावात्मकता, ओज, गांभीर्यता, निर्भीकता, सरलता ओर प्रवाहमयता स्पष्ट परिलक्षित होती है। उन्होंने कर्मयोगी, स्वराज्य, अभ्युदय, हितवार्ता, सरस्वती समाचार पत्र पत्रिकाओं में अपनी कलम से नये भारत का नवनिर्माण किया। विद्यार्थी जी ने साप्ताहिक प्रताप को दैनिक प्रताप में परिवर्तित कर एक संपादक, एक लेखक के रुप में राष्ट्रहित में जन- जागरण का महत्वपूर्ण कार्य किया। वे स्वतंत्रता संग्राम के अमर सेनानी थे। आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी उनकी लेखनी के प्रशंसक रहे ओर अपनी पत्रिका सरस्वती में विद्यार्थी जी ने अपना लेख आत्मोसर्ग प्रकाशित कराया। वे बाल गंगाधर तिलक , महात्मा गांधी से बहुत प्रभावित थे। उनकी लिखी शेखचिल्ली की कहानियां पाठक आज भी चाव से पढते हैं। आत्मोसर्गता नामक संग्रह में उनकी अपूर्व शैली के दर्शन होते हैं। उनके सारे निबंध त्याग और बलिदान पर आधारित हैं। श्री वत्स ने कहा कि गणेेेश शंकर विद्यार्थी का व्यक्तित्व एवं कृतित्व भावी पीढी और पत्रकारिता जगत के लिए प्रेरणादायक है।

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3rd National Group Art Exhibition 2017 “Creations – Creative Expression” Dedicated to Albert Einstein


Art in Nature & Nature in Art
Creationism is the religious belief that the Universe and life originated ‘from specific acts of divine creation.’ For young Earth creationists, this includes a biblical literalist interpretation of the Genesis creation narrative and the rejection of the scientific theory of evolution. "Creationism" can also refer to creation myths or to the concept of the origin of soul.

Dr Aarti Makkar, organiser, express, more than 50 artists with Age Group (6 to 82) are participating in the exhibition from all over India and joining us with their beautiful series of works. Each Work has a great meaning and every Artist has a beautiful message to convey the characteristics of life in more prominent way. This Art Exhibition is a pure example of true inclusion where the artist, exhibiting their art work without bias of label of disability.

Here we are trying to create a new Chapter in the field of Art and Culture. And this is a great honour for us that the event shall be inaugurated by Chief Guest Hon’ble Shri John Philipose (Renowned Museologist, Interior Designer) and the Chief Patron of our National Group Art Exhibition Hon'ble Shri Sandeep Marwah Ji Founder Director (Marwah Studios) President, ICMEI. 

Event was graced with the kind presence of all the spest guests & Guest of Honour-
Hon’ble Shri Lalit Jain ji (Renowned Sr Artist & Art Consultant), Hon’ble Jagjeet Rana ji,(Renowned Cartoonist & Art Consultant),Hon’ble Dr Harvinder Mankar(Renowned Director, Cartoonist),Hon’ble Smt. Puneeta Chandna ji (Renowned Motivator & Art Consultant), Hon’ble Shri Obaid Naizi ji (Sr Consultant, All India Radio), Hon’ble Smt Neetu Singha ji(Chief Editor Mission Navdristi Times), Hon’ble Smt Dr Amit Kaur (Scientist & Artist), Hon’ble Smt & Shri Abhishek Bachchan (Founder Director All India Achievers conference)

List of Participating Artists
Child Artist -Gaurav Makkar, Khushi Makkar, Ansh Malik, Satvik Sharma, Anupriya Sethi, Suhani Singhal, Ekaagra Gupta, Stuti Gupta, Nanika Gupta

International Artist- ClaraMorgenthau (Germany) 

Participating Artist from all over IndiaVandana Singh (Noida), Rakhi Roy(SiliGuri), Bhawana Yadav (New Delhi), Dr Rekha Rani Sharma (GorakhPur), Ms Pratima Kapoor (Chandigarh), Dr Jayant Pansare (Nagpur, Maharashtra), Biswaji Paul (SiliGuri), Nitika Babar (New Delhi), Minaxi Adeshara (Baroda), Jyothi Prakash(Banglore), Yashika CG (Banglore), Babun Ghosh (Banglore, India), Somya Waliya (Chandigarh), Kumud Singh (Ayodhya Fazabad), Vikas Kumar (Chennai, India)Geetanjali Agrawal (Allahabad UP), Mamta Saxena (Noida, India), Priti Giri (Aligarh), Dr Indira Agrawal (Aligarh), Sakshi Mishra(Jhansi), Rashida Kalangi (Hyderabad, Telangana), Mrs. S Jaya Priya Siddharthan Chennai, Hitesh Sharma (UP),Prachi Sharma (Meerut, India), Aishwarya Banerjee, Bhavya Verma (Bangalore), Apoorva Singh(Ghaziabad), Parminder Kaur (Mumbai, Maharashtra, India), Nilima Agarwal Pankaj Verma (UP), Kamini (New Delhi), Priyanka & Vivek (New Delhi), Nirney Madaan (New Delhi, India), Akansha Yadav (New Delhi), Asad Ejaz (Ghaziabad), Shivam Singh (Dehradun, Uttrakhand, India), Arijit Pal (Gurdaspur, Punjab), Rohit Garg (New Delhi), Mohd Shakil (New Delhi), Vikram Singh with his son Jivesh (New Delhi), Biswaranjan (New Delhi), Jyoti Sahni(Lucknow), Neha Sahu (Noida), Prabhu Dayal (Jaipur, Rajasthan) Ishwar Kaushik (Haryana), Sandeep Pujara (Karnal)

Happy Birthday- Raveena Tandon


Wednesday, October 25, 2017

असंवेदनशील समाज में मानवीय मूल्यों को जन-जन तक पहुंचाने का सार्थक प्रयास है डॉ. अनुज का सद्य प्रकाशित उपन्यास दैट ऐरोटिक साइलैंस: दयानंद वत्स


अखिल भारतीय स्वतंत्र पत्रकार एवं लेखक संघ के राष्ट्रीय महासचिव, गांधीवादी विचारक एवं चिंतक दयानंद वत्स की अध्यक्षता में आज संघ के मुख्यालय बरवाला दिल्ली में विश्वविख्यात माइक्रो सर्जन डॉ. अनुज द्वारा लिखित उपन्यास दैट ऐरोटिक साइलैंस पर एक सार्थक परिचर्चा का आयोजन किया गया।

उपन्यास की प्रासंगिकता पर अपने अध्यक्षीय संबोधन में अपने विचार प्रकट करते हुए श्री दयानंद वत्स ने कहा कि आज के असंवेदनशील समाज में मानवीय मूल्यों को जन-जन में प्रतिस्थापित करने में डॉ. अनुज का यह उपन्यास सार्थक सिद्ध होगा। 

डॉ. अनुज द्वारा लिखित "दैट एरोटिक साइलेंस" अपने आप में एक ऐसी रचना है जो संभवतः आने वाली युवा पीढ़ी के समग्र विकास का द्योतक साबित होगी। मेरा यह मानना है कि यह उपन्यास भविष्य में डॉ अनुज के लिए मील का पत्थर साबित होगा। जिस तरह से वह हस्त शल्य चिकित्सा (हैंड सर्जन) और सूक्ष्म शल्य चिकित्सा (माइक्रो सर्जन) के क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर ख्याति प्राप्त कर चुके है उसी तरह इस उपन्यास के ज़रिए देश विदेश में एक लेखक के रुप में भी अपनी अमिट छाप अवश्य छोड़ेंगे । इस उपन्यास की महत्ता बताते हुए श्री वत्स ने कहा कि "यह मैं व्यक्तिगत तौर पर मानता हूँ कि यह रचना लोगों की वर्तमान मनोदशा का उचित मार्गदर्शन कर मानवीय मूल्यों को जन-जन तक पहुंचाएगी । इस पुस्तक में निहित सभी घटनाएं एक ज्वलंत समस्या का दूरदर्शितापूर्ण समाधान है। जिसको डॉ अनुज ने अपने कलम से इस तरह से उकेरा है कि समाज के लिए यह एक धरोहर होगी। जिसके माध्यम से समाज के सभी वर्ग अपनी कल्पनाओं से परे हटकर धरातल पर कुछ कर गुजरने की क़ुव्वत रख सकेंगे। इस उपन्यास का नायक ज़िंदगी की आपाधापी में एक ऐसी कलुषित संवेदनाओं से जूझ रहा है जो मानवीय मूल्यों पर करारा आघात कर रहा है। इसीलिए मैं व्यक्तिगत तौर पर डॉ अनुज का धन्यवाद ज्ञापन करना चाहता हूँ कि उन्होंने विश्व पटल पर एक ऐसी नयी विषय वस्तु को रखा है जो असंवेदनशील समाज को उनका आईना दिखाने में समर्थ है।

The Chhath Puja - tuning our LIFE with NATURE

Chhath, also known as Dala Chhath is an important festival celebrated in Bihar and many other parts of India in which setting Sun (dawn) is worshiped . Although Bihar celebrates Chhath most elaborately it is also followed in some parts of West Bengal, Jharkhand, Orissa, Assam, Mauritius, mainly among the Bhojpuri and Maithali speaking people. Chhath is also important for Nepalese worshippers of god as well as in eastern Uttar Pradesh.The best place to witness Chhath would be around Northern Bihar where it is celebrated in great grandeur. The festival is observed and in Bihar since time immemorial with the constant faith that the Sun God fulfils wishes if 'araghya' is offered with complete dedication and devotion. Chhath is not just a physical attachment to the people of Bihar, it is also present in their hearts, and this is why the people bring wherever they have migrated. Nowadays it can be easily seen at the ghats of Yamuna in Delhi and other parts of India indicating its presence across the country.

It is a festival connected with purity, devotion to the Sun God who is considered as the source of life on this earth and is regarded as wish fulfiller.

The festival is with an aim to express thanks to Sun God for offering energy to earth continuously enabling the environment suitable for the people to live.

In the evening arghya people express their thanks to Sun God for its work in growing their crops during the preceding year and morning arghya is considered as a request for a bountiful crop, peace and prosperity in the year to come.

Devotees assemble at the ghats at rivers and ponds including Ganges and take a holy dip before preparing offerings (Prasad). The main constituent of the offerings are Thekua, which is a wheat based cake.

Offerings are preferably cooked on earthen Chulha (oven). Some traditions are exercised with little difference varying from region to region and across the families with basic similarity.

During the , offerings are contained in small, semicircular pans woven out of bamboo strips called soop.
Chhath is a Hindu festival but many muslim families also participates in this holy festival.

Chhath is also called ‘Suryasasthi’ as it observed after the six days of Diwali, the festival of light. Chhath takes place during 6th day (Shasthi) lunar fortnight of Kartik month. lasts for four days. There is also a "Chaiti Chhath" just after Holi during Chaitra Navratri in the month of Chaitra (March last to mid April).


First Day of Chhath Puja: Nahai Khai Nahai Khai (Bath & Eat)
The first day of the puja is known as Nahai Khai (Bath & Eat), the Vrati (devotees) take a bath preferably in sacred river Ganga and bring the holy water to cook offerings (Prasad) at home.

Second Day of Chhath Puja: Kharna
A whole day fast (without water) is observed by the vratis (devotees). The vratis end their fast in the evening after performing puja. Offerings (Prasad) are comprises of Rasiao-kheer (rice delicacy), puris (deep-fried puffs of wheat flour) or chapatti and bananas - are distributed among family, friends and visitors.

Third Day of Chhath Puja: Chhat Sandhya Argh (Chhat Dala Evening puja) Devotees observe fast without consuming water. The whole day is spent in preparing puja offerings. All the offerings are kept in tray made up of bamboo. Offerings comprises of Thekua, coconut, banana and other seasonal fruits.

The evening ritual is performed at the banks of river or pond or any clean water body. All the devotees, family, friends and visitors assemble their and the agrahya is offered to the setting Sun. ‘Kosi’ – One of the most charming events during Chhath Puja known as ‘Kosi’ is celebrated at the courtyard of the house after evening offerings. Lightened earthen lamps (diyas) are kept beneath the covering of five sugarcane sticks or 24 sticks (as per local tradition). The same event also takes place at the ghats in the early morning before morning offerings (arghyas).

Fourth Day of Chhath Puja: Chhath Suryodaya Argh (Chhath Dala Morning puja) This is the last and final event of the auspicious puja, the devotees again with their family, friends and relatives assemble on the bank of river or pond to offer arghyas (offerings) to the rising Sun. After performing arghyas devotees break their fast. Ginger and Sugar are used by devotees to break their fast (as per local tradition).

Know more about Chhath festival 

Happy Birthday- Salma Agha


Tuesday, October 24, 2017

सर्वोदय कन्या विद्यालय, नरेला नम्बर-1 की छात्राओं ने शिक्षा निदेशालय जिला उत्तर पश्चिम क्षेत्र-10 की अंडर-19 सीनियर गर्ल्स कबड्डी प्रतियोगिता में पाया प्रथम स्थान


सर्वोदय बाल विद्यालय प्रहलादपुर बांगर के क्रीड़ांगन में आज शिक्षा निदेशालय जिला उत्तर पश्चिम, क्षेत्र-10
की अंडर-19 सीनियर गर्ल्स कबड्डी प्रतियोगिता का आयोजन प्रधानाचार्य श्री वी.के शर्मा एवं शिक्षाविद् दयानंद वत्स के सान्निध्य और क्षेत्र 10 के वैन्यू प्रभारी श्री विक्रम देसवाल की देखरेख में संपन्न हुआ। क्षेत्र-10 के 15 स्कूलों की छात्राओं ने इसमें हिस्सा लिया। बहुत ही कडे संघर्ष के बाद सर्वोदय कन्या विद्यालय नंबर-1, नरेला की टीम ने सर्वोदय कन्या विद्यालय खेडाखुर्द को हराकर प्रथम स्थान प्रथम स्थान प्राप्त किया। खेडाखुर्द दूसरे और सर्वोदय कन्या विद्यालय पूठखुर्द और नरेला नंबर-2 तीसरे स्थान पर रहे। इस अवसर पर विभिन्न स्कूलों से अपनी टीमों के साथ आए खेल शिक्षकों में श्री रोहतास डबास, श्री विनोद खत्री, नवीन खुल्बे, श्री बिजेंद्र, अशोक मान, रमेश डबास, श्रीमती बीरमती, श्रीमती सुमन, श्रीमती. मुकेश डबास, श्रीमती पूनम, श्रीमती वंदना, श्रीमती बीना भारद्वाज ने अपनी टीमों की छात्राओं का उत्साहवर्द्धन किया। इस अवसर पर अपने संबोधन में शिक्षाविद् दयानंद वत्स ने कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों में स्कूली छात्राओं का खेलों में अधिकाधिक भाग लेना एक शुभ संकेत है। हमारी बेटियां खेलों में भी नाम कमा रही हैं। इसके लिए उनके खेल शिक्षक बधाई के पात्र हैं। प्रधानाचार्य श्री वी. के शर्मा ने विजेता टीम को अपनी शुभकामनाएं दी ओर अन्य टीमों की छात्राओं को भी अच्छी खेल भावना से खेलने पर बधाई दी और कहा कि बेटियों ने यह साबित किया है.कि वे बेटों से किसी भी क्षेत्र में कम नही हैं।

Happy Birthday- Mallika Sherawat


Happy Birthday- Anurag Thakur


Monday, October 23, 2017

सर्वोदय बाल विद्यालय प्रहलादपुर बांगर के दिव्यांग छात्र विनय ने पूरी दिल्ली में 100 मीटर दौड मे पाया प्रथम स्थान


सर्वोदय बाल विद्यालय प्रहलादपुर बांगर के प्रांगण में आज शिक्षाविद् दयानंद वत्स के सान्निध्य में प्रधानाचार्य श्री वी.के शर्मा ने नौवीं कक्षा के दिव्यांग छात्र विनय का जोरदार अभिनंदन किया। विनय ने हाल ही में नई दिल्ली नगर पालिका परिषद् द्वारा तालकटोरा स्योटेडियम में आयोजित प्रथम दिल्ली स्टेट स्कूल लेवल एथलेटिक्स मीट फॉर दिव्यांग में वन लैग लोकोमीटर डिस्एबलिटी विद 80./. की सौ मीटर दौड में पूरी दिल्ली में प्रथम स्थान प्राप्त किया। पुरस्कार स्वरुप विनय को एक हजार रुपये नकद, स्वर्ण पदक, प्रमाण पत्र और ट्राफी देकर सम्मानित किया गया। विनय की इस सफलता में उनके स्पेशल एजुकेशन टीचर श्री मनोज कुमार जायसवाल का विशेष योगदान रहा है। इस मौके पर स्कूल के पीइटी श्री रोहताश डबास भी उपस्थित थे। विनय को अपनी शुभकामनाएं देते हुए शिक्षाविद् दयानंद वत्स ने कहा कि एक पैर में अस्सी प्रतिशत दिव्यांगता के बावजूद विनय ने पूरे मनोयोग से प्रतियोगिता में प्रथम स्थान प्राप्त करके स्कूल और राज्य का नाम रोशन किया है। प्रधानाचार्य श्री वी. के शर्मा ने विनय की इस उपलब्धि पर हर्ष व्यक्त करते हुए उसे अपनी बधाई दी।

Javed Ali first Gujarati song Ankhon Ma Tu from the Movie Hu Tara ishq Maa Out Now


Romance is the key of every Love Story and romantic songs are always its most powerful USP. From old time single screen theatres to this multiplex culture, love songs are the single most distinguishable character of Indian movies. 

Come love to lose our self in romantic melody which is released recently by Blue Diamond Production House Gujarati Movie “Hu Tara Ishq Maa”, “Ankhon Ma Tu” sung by none other Bollywood heart throb singer Javed Ali and singer Pamela Jain the romantic number featuring debutant Suraj Kumar and actress Priya Soni. This is first time Javed Ali lend his voice in Gujarati Cinema.

It seems Gujarati filmmakers are slowly bringing back real romance to Gujarati soundtracks. “Ankhon Ma Tu” will surely trap you into an atmosphere where only love is in the air! This lovely music from Manoj Vimal and the magical voice of Javed Ali will make you feel love like never before.

Who I am !!!

Poem by S.S.Dogra

Who I am !!!
I am a small drop
In this big World
Sometime underestimated
Or may be overestimated
But what really I am
Only Almighty knows or
The People Whosoever
Come across
In the life Journey ………
I Always explore & eager
to make you all a precious part of
all my creativity
To bring liveliness in
My small yet meaningful Valley of love
Still wants to know
Who I am!!!

Happy Birthday- Urmila Porwal


Sunday, October 22, 2017

हिंदी और बंगाली सिनेमा के सुप्रसिद्ध फिल्म निर्माता, निर्देशक और अभिनेत्री रानी मुखर्जी के पिता राम मुखर्जी का आकस्मिक निधन फिल्मजगत की अपूरणीय क्षति: दयानंद वत्स


अखिल भारतीय स्वतंत्र पत्रकार एवं लेखक संघ एवं नेशनल मीडिया नेटवर्क के राष्ट्रीय अध्यक्ष दयानंद वत्स ने अभिनेत्री रानी मुखर्जी के पिता, हिंदी और बंगाली फिल्मों के मशहूर निर्माता, निर्देशक और स्क्रीन राईटर तथख मुंबई में फिल्ममालय स्टुडियो के संस्थापक श्री राम मुखर्जी के आकस्मिक निधन को हिंदी और बंगाली सिनेमा की अपूरणीय क्षति बताते हुए स्वर्गीय श्री राम मुखर्जी को उनके लाखों प्रशंसकों की ओर से अपने श्रद्धा सुमन अर्पित किए। 

श्री वत्स ने कहा कि 1964 में राम मुखर्जी ने अपने निर्देशन में दिलीपकुमार और.वैजंतीमाला को लेकर 'लीडर' फिल्म बनाई थी जो एक पॉलिटिकल ड्रामा थी। लीडर फिल्म का संगीत नौशाद साहब और गीत शकील बदायूंनी ने लिखे थे। मोहम्मद रफी की आवाज में गाया गीत "अपनी आजादी को हम हरगिज भुला सकते नहीं, सर कटा सकते हैं लेकिन सर.झुका सकते नहीं"आज भी लोगों की जुबान पर चढा है। 

इसी फिल्म का एक अन्य गीत "मुझे दुनिया वालो शराबी ना समझो" ओर "एक शहंशाह ने बनवाके हसीं ताजमहल सारी दुनिया को मुहब्बत की निशानी दी है"आज भी अमर हैं। "तेरे हुसन की क्या तारीफ करुं कुछ कहते हुए जी डरता है" और आशा भोंसले का गाया गीत "दैय्या रे दैय्या चढ गयो पापी बिच्छुआ" गीत आज भी उतना ही लोकप्रिय है जितना 1964में था। जॉय, देब मुखर्जी एवं तनुजा को लेकर राम मुखर्जी ने एक बार मुस्कुरा दो बनाई। अपनी सुपुत्री रानी मुखर्जी को लेकर उन्होंने राजा की आएगी बारात फिल्म बनाई। राम मुखर्जी को गीत और संगीत की अच्छी परख थी। श्री वत्स ने कहा कि राम मुखर्जी बहुआयामी प्रतिभा के धनी फिल्मकार थे। उनके निधन से फिल्मोद्योग ने अपना एक अनमोल रत्न खो दिया है।

Leadership for Global Harmony

-Commander VK Jaitly 

We live in a beautiful world. But this world has seen the ugliest of horrific scenes of cruel killings, carnage, loot, plunder and destruction during its known history of thousands of years. Such incidents in the ancient times and medieval periods could be attributed to the ignorance or lack of understanding amongst the leaders of those times. A bit deeper investigation may reveal that all those conflicts, battles or wars had been the result of one of the two elements: The Hatred and The Greed. One of these two or both have been the root cause of any dispute anywhere in the world at any time. And these two elements continue to disturb this world even today in the 21st century when we consider that mankind has progressed by leaps and bounds in many areas of science and technology. Even our higher educational levels, better social understanding and global awareness have not been able to put an end to such bloody local conflicts and fear of even a third world war.

Under such circumstances, I got an invite from an Association of Defence Advisors of African countries based at New Delhi to speak to them on a relevant topic that is current, general and even their spouses should also be able to enjoy and relate with it. So finally, I was requested to give a talk on “Leadership for Global Harmony” where the Ambassador of Senegal was to be the Chief Guest and total gathering was expected to be about 40 defence officers with spouses from 15 African countries. The topic continues to be current and so highly relevant while we keep reading news about Boko Haram, ISIS, Jaish-e-Mohammad or Kim Jong Un of North Korea.

I started my talk by paying my tributes to some of the Global Leaders who stood for Global Peace throughout their lives. The audience joined me in naming such stalwarts that included Nelson Mandela, Mahatama Gandhi, Martin Luther King, Julius Nyerere and a few others. The Leadership of Narendra Modi came in for great praise for the way he had taken initiatives to improve relationships with the immediate neighbouring countries and also had struck a very delicate balance in managing excellent relationship with Russia, China, Japan and US at the same time. Some of them don’t see eye to eye with each other. Modi’s call for “सबका साथ, सबका विकास“ meaning “Embrace All and Development for All” blunted his worst critics. His philosophy of “Opportunities for All and Appeasement for None” has endeared him to the masses from all castes, creeds and religions in India.

One thing common about all these great global leaders is that they were/are dreamers. And they followed their dreams with action. Such great leaders convert their dreams into strong desires and that gives them a direction and then they move in that direction with dedication, determination and discipline. It is also a fact that all such great leaders like Gandhi, Mandela etc. could not ensure world peace even during their lifetimes. Yes, they did fail. But they kept on trying. They kept on giving the message of world peace and global harmony and its importance for co-existence. According to them, “Winners are not the ones who never fail, but the Winners are those, who never quit.” And these great leaders never gave up. They were not quitters. 

Today, as leaders, be in the corporate world, politics, social service, military service or any civil service, let us dream of a World with Complete Harmony. Let us dream of a world that is best described by Guru Rabindra Nath Tagore in these lines: 

Where the mind is without fear and the head is held high
Where knowledge is free
Where the world has not been broken up into fragments
By narrow domestic walls
Where words come out from the depth of truth
Where tireless striving stretches its arms towards perfection
Where the clear stream of reason has not lost its way
Into the dreary desert sand of dead habit
Where the mind is led forward by thee
Into ever-widening thought and action
Into that heaven of freedom, my Father, let my country awake
Today, the humanity needs the Leadership at all levels and everywhere that believes  in respect and dignity for all irrespective of differences of caste, creed, colour, language and religion. We need a leadership that says ‘Yes’ to Collaboration and ‘No’ to Confrontation. We need a leadership that says ‘Yes’ to Co-operation and ‘No’ to Conflict. We need a leadership that says ‘Yes’ to Co-existence and ‘No’ to Chaos. 

It is high time that humanity realizes that all paths lead to the same almighty. It is important that the leadership of all religions re-interpret their scriptures and pronounce that “Respect for All and Hatred for None” is the new dictum for this century and that alone can ensure global peace and harmony. एकं सत, विप्रा बहुधा वदन्ति  (Truth is One, The learned call Him by different names). It may be a better idea to embrace Godliness and say Good Bye to multitude of religions. Religions lead to only rituals and lead you on a narrow rigid path claiming your own path to be the only correct one and denigrating the paths prescribed by other religions. While the path of Godliness transcends you to higher levels of spirituality. Godliness proclaims Oneness of the Human kind and in fact all creations of God. It in fact, invokes respect for everything on this earth including all the animals, birds, the forests and all the natural resources. So the concept of Godliness advocates the controlled use of all natural resources just for the basic needs of all on this earth and not for the greed of a few. 

The current and future global leadership will have to pay heed to what great Mahatma Gandhi once said, “The world has enough for everyone's need, but not enough for everyone's greed.” The strong and powerful nations shall have to respect the sovereignty of even smaller nations. The natural resources of smaller countries should not be exploited by the developed and powerful countries. Every country small or big has absolute control over its resources.

Let us say Good Bye to Greed and Hatred and pave the way for a Peaceful World and Global Harmony. The differences could still be there and they should be resolved by the leaders at all levels through Dialogue, Dialogue and Dialogue and there lies the solution to all problems sooner or later. Let us not be the prisoners of past anymore but the architect of the future, the new future, the glorious future. 

Happy Birthday- Kader Khan


Saturday, October 21, 2017

शहनाज हुसैन ने हिमाचली नेताओं को आकर्षक दिखने के गुर बताए ।


शहनाज हुसैन

सौन्दर्य विशेषज्ञ तथा हर्बल क्वीन के रूप में लोकप्रिय पदम अवार्ड विजेता शहनाज हुसैन ने आगामी विधान सभा चुनाव लड़ रहे बिभिन्न उम्मीदवारों को चुनाव अभियान के दौरान सौंदर्य के माध्यम से चुनाव जितने के गुर दिए हैं/

सौन्दर्य विशेषज्ञ शहनाज हुसैन ने बताया की पश्चिमी देशों में चुनावों में दौरान नेताओं में आकर्षकए सुंदर और सुडौल दिखने की होड़ लग जाती है। क्‍योंकि यह माना जाता है कि चुनाव लड़ने वाले उमीदवारों के रंग ,रूप, सुन्दरता दिखावे और हाव.भाव का मतदाताओं पर सीधा असर पड़ता है। तथा इससे चुनावी नतीजे प्रभावित होते हैं। विभिन्‍न चुनावी विशेषज्ञों द्वारा समय.समय पर किए गए रिसर्च से यह सामने आया है कि युवा , सुंदर तथा आकर्षक, खुशनुमाए, छैल छबीले , फैशन एबल तथा विश्‍वास से भरे उम्‍मीदवारों को मतदाता विश्‍वास योग्‍य तथा निपुण मानते है तथा ऐसे उम्‍मीदवारों पर सर्वाधिक भरोसा करते हैं जिससे उनके जीतने के अवसर ज्‍यादा बढ़ जातेहैं।

चुनावों के दौरान युवा तथा महिला मतदाता सुंदर तथा आकर्षक उम्‍मीदवारों से सम्‍मोहित हो जाते हैं तथा चुनावी रैलियों में क्षणभर में ही उनके समर्थक बन जाते हैं। चुनावों के दौरान अपनी साफ छवि, आकर्षक व्‍यक्तिगत,चेहरे, शारीरिक दिखावट, ड्रेस तथा मेकअप के प्रति संवेदनशील उम्‍मीदवार अपने विरोधी उम्‍मीदवारों पर भारी पड़ते है। राज्य की दोनों मुख्य राजनीतिक दलों द्धारा उम्मीदवारों की घोषणा की साथ ही , हिमाचल प्रदेश में नौ नवंबर को होने वाले चुनाबों के चुनाव अभियान ने जोर पकड़ना शुरू कर दिया है तथा वोटरों का रूझान भी सामने आना शुरू हो गया है। राज्‍य के ज्‍यादातर इलाकों में आजकल शरद लहर देखने में मिल रही है

सौन्दर्य विशेषज्ञ शहनाज हुसैन ने बताया की सर्दियों की आहट के साथ ही वातावरण में नमी कम होने लगती है जिसमें दिनभर धूप, धूल, मिट्टी, कच्‍ची सड़कों तथा प्रदूषण में चुनाव अभियान चलाने वाले उम्‍मीदवारों की त्‍वचा सूख जाती है और उनके चेहरे पर पपड़ी जम जाती है तथा कील मुहांसे,फोड़े.फुंसी आदि निकल जाते हैं तथा होंठ भी फट जाते है एवं बाल उलझ जाते है जिसमें उम्‍मीदवारों के व्‍यक्तित्‍व पर विपरीत प्रभाव पड़ता है जिससे उनके प्रति वोटरों में आकर्षण कम हो जाता है। चुनावों के दौरान उम्‍मीदवार दिनभर विभिन्‍न चुनावी सभाएं, नुक्‍कड़ बैठकें करके उम्‍मीदवारों को रिझाने की पुरजोर कोशिशें करते हैं। जिसमें वह सूर्य की गर्मी, धूप, मिट्टी तथा प्रदूषण को सीधे तौर पर झेलतेहैं। सूर्य की गर्मी तथा रसायनिक प्रदूषणकी वजह से त्‍वचा का सामान्‍य संतुलन बिगड़ जाताहै। जिसमें त्‍वचा में रूखापन,चकते, फोड़े.फुंसियां तथा काले घब्‍बे आने शुरू हो जाते है।

सौन्दर्य विशेषज्ञ शहनाज हुसैन ने बताया की चुनावों के दौरान बालों को धूल ,मिट्टी तथा प्रदूषण से बचाने के लिए नियमित तौर पर हर्बल शैम्‍पू से सिर धोना चाहिए। अकसर उम्‍मीदवार प्रत्‍येक दिन सैकड़ों लोगों से हाथ मिलाते हैं बच्चों को चूमते है या वजुर्गों के पांव छूते है जिससे उन्‍हें संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है। उम्‍मीदवारों को चुनावी मौसम में अपने हाथ नियमित रूप से हैंड सेनीटाजर से साफ करने चाहिए। नवंबर में होने वाले हिमाचल विधानसभा चुनावों के लिए मतदाताओं को रिझाने के लिए निकले खासकर लोअर हिमाचल के उम्‍मीदवारों के चेहरे पर सूर्य की अल्‍ट्रावायलेट किरणों का सीधा प्रभाव पड़ता है। इससे त्‍वचा में नमी की कमी आ जाती है जिससे चेहरे पर झुर्रिया और रेखाएं पड़ जाती है। उम्‍मीदवरों को अपनी त्‍वचा खासकर चेहरे की आभा को बचाए रखने के लिए 30 या 40 एसपीएफ सनस्‍क्रीन लोशनध्क्रीम का लेप करना चाहिए तथा यदि उम्‍मीदवार को दिनभर 10 से 12 घंटे तक खुले आसमान की धूप में प्रचार करना पड़े तो सनस्‍क्रीन को दो बार लगाना चाहिए।

सौन्दर्य विशेषज्ञ शहनाज हुसैन ने बताया की धूप में लगातार चुनाव प्रचार से उम्‍मीदवार की त्‍वचा में कालापन एवं रूखापन आ जाता है जिससे बचाव के लिए उम्‍मीदवार को अच्‍छी गुणवत्‍ता की एंटी.टेन सनस्‍क्रीन लगानी चाहिए जो कि बाजार में आसानी से उपलब्‍ध है।

हालांकि अधिकांश सनस्‍क्रीन क्रीमों में मस्‍चुराइजर विद्यमान है लेकिन फिर भी यदि आप शिमला के ऊपरी हिस्‍सों लाहौल स्पीति , पांगी ,भरमौर, किन्‍नौर जैसे ठंडे स्‍थानों से चुनाव लड़ रहे हैं तो रूखी त्‍वचा को सामान्‍य बनाने के लिए पहले त्‍वचा पर मॉस्‍चुराइजर लोशन का लेप करे तथा कुछ मिनट तक इस लेप को सैटल होने दें एवं उसके बाद सनस्‍क्रीन लोशन त्‍वचा पर लगाएं। उम्‍मीदवारों को सनस्‍क्रीन दिन के चुनाव प्रचार शुरू करने के 20 मिनट पहले त्‍वचा पर अच्‍छे से मालिश करके लगानी चाहिए। उम्‍मीदवारों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उनकी त्‍वचा में नमी की मात्रा हमेशा संतुलित रहें।

सौन्दर्य विशेषज्ञ शहनाज हुसैन ने बताया की विधानसभा चुनाव लड़ रहे उम्‍मीदवारों को रात्रि में विश्राम करने से पहले अपनी त्‍वचा को अच्‍छी तरह साफ कर लेना चाहिए। पंजाब से सटे ऊना ,कांगड़ा ,सोलन ,सिरमौर जिलों के उम्‍मीदवार कच्‍ची सड़कों पिछड़े क्षेत्रोंए सुदूर गांव में व्‍यापक चुनाव अभियान चलाते हुए दिन में दस से 12 घंटों तक सड़कों की धूल खाते है जिससे उनकी त्‍वचा खराब हो जाती है। वातावरण में विद्यमान विभिन्‍न हानिकारक रसायनिक प्रदूषणों से बचाव के लिए आजकल चंदन, एलोवेरा , गुलाब, तुलसी आदि संघटक तत्‍वों से बनी कवर क्रीम भी बाजार में आसानी से उपलब्‍ध है। तथा उम्‍मीदवारों को इन क्रीमों का अत्‍याधिक लाभ उठाना चाहिए क्‍योंकि इससे चेहरे तथा त्‍वचा को प्रदूषण और रसायनिक तत्‍वों से पूरी तरह संरक्षण उपलब्‍ध होगा तथा उम्‍मीदवारों के चेहरे की आभा में निखार आएगा जिससे उनमें आत्‍मविश्‍वास बढ़ेगा। इस दौरान बालों की सुदंरता तथा प्राकृतिक स्‍वरूप को बनाए रखने के लिए हेयरक्रीम तथा सीरम का उपयोग किया जा सकता है। चुनावों में शरीर की सफाई के लिए साबुन की जगह क्‍लींजिंग क्रीम या एलोवेरा जैल का उपयोग करना चाहिए। तथा रात को सोने से पहले चेहरे पर नरीशिंग क्रीम का जरूर उपयोग करें। यदि आप जनजातीय क्षेत्रों लाहौल स्‍फीतिए भरमौर एवं किन्‍नौर आदि में चुनाव प्रचार कर रहे हैं तो नरीशिंग क्रीम में पानी की कुछ बूंदे डालकर चेहरे की लगातार मसाज कीजिए/ नरीशिंग क्रीम से त्‍वचा की नमी को बनाए रखने की क्षमता में वृद्धि होती है। चुनावों में सर्दी की वजह से ऊपरी पर्वतीय क्षेत्रों के उम्मीदवारों के होंठ फट जाते हैं तथा इसके लिए रात्रि को होंठो को साफ करने के बाद उन पर बादाम तेल की मालिश करे और इसे रात्रि भर रहने दे। चुनावों में लंबे तथा थकाऊ चुनाव प्रचार के दौरान बालों को मुलायम तथा चमकीला बनाए रखने के लिए उन्हें बार बार ताजे साफ पानी से धोएं तथा शैंपू का न्‍यूनतम उपयोग करे।

Tribute to Legend Hindi Film Actor Shammi Kapoor Saheb on his Bday


है  दुनिया उसी की, जमाना उसी का
मोहब्बत में जो हो गया हो किसी का
दिल के झरोखे में जुझको बैठाकर,
यादों की तेरी मैं महफ़िल बनाकर
रखूँगा दिल के पास, मत हो मेरी जां उदास.
ये चाँद सा रोशन चेहरा, जुल्फों का रंग सुनहरा,
तारीफ करूँ क्या उसकी जिसने तुम्हें बनाया.
किस किस को किस करूँ, किस किस को मिस करूँ,
चाहे मुझे कोई जंगली कहे...


आज भी उपरोक्त गाने के बोल भारतीय हिंदी फिल्मों के मशहूर कलाकार की यादें ताजा कर देतें हैं.

The most popular dancing star of Indian film industry was born today. The yahoo boy who won the hearts of many young girls & guys with his extraordinary dancing & acting skills. Yes of course, he is the son of great Prithvi Raj Kapoor. Yes, he is none other than Shammi Kapoor.

He was born on 21st October, 1930 in Mumbai-Maharashtra. Blue eyed young man with height of 6ft created an exemplary image with his talent. His real was Shamsher Raj Kapoor. Shammi was the second of the three sons born to Prithviraj (the other two being Raj Kapoor & Shashi Kapoor), both successful bollywood actors. Kapoor had a short stint at Ruia College after which he joined his father’s theatrical company Prithvi Theatres. He entered the cinema world in 1948, as a junior artiste. He made his debut in Bollywood in the year 1953, when the film Jeevan Jyoti was released. It was directed by Mahesh Kaul and Chand Usmani was Kapoor’s first heroine.

Kapoor met Geeta Bali in 1955, during the shooting of the film Rangeen Raaten, where he was the leading actor and she played a cameo. Four months later, they married and had a son, Aditya Raj Kapoor, on 1 July 1956, Mumbai, a year after they were married. Five years later, in 1961, they had a daughter, Kanchan Kapoor started out with serious roles but with Filmistan's Nasir Hussain directed Tumsa Nahin Dekha (1957) opposite Ameeta and Dil Deke Dekho (1959) with Asha Parekh, he attained the image of a light-hearted, and stylish playboy.

With Junglee (1961) his new image was cemented and his subsequent films were all in this genre. Mohammed Rafi was frequently chosen as his playback voice. In his early career in the fifties, he acted with established heroines: with Madhubala in films such as Rail Ka Dibba (1953) and Naqab, with Nutan in Laila Majnu, with Shyama in Thokar and with Nalini Jaywant in Hum Sab Chor Hain. In the 1960s however he was often paired with new heroines such as Asha Parekh, Saira Banu, and Sharmila Tagore, all of whom had very successful careers.[6] Of all his heroines, he said that Sharmila Tagore, Rajshree, and Asha Parekh were easy to work with Sharmila Tagore and Saira Banu made their Bollywood debuts with Shammi Kapoor in Kashmir Ki Kali and Junglee respectively[8] He and Asha Parekh were paired together in four films, including the murder mystery Teesri Manzil (1966) and the romance film Jawan Mohabbat.

In the early fifties Kapoor accepted serious roles in films such as Shama Parwana (1954) with Suraiya, comedy flick Mem Sahib (1956) with Meena Kumari, and thrillers like Chor Bazar (1954), as well as in the tragic love story Mirza Sahiban (1957) opposite Shyama.[9] He gained more widespread popularity with the successful films Tumsa Nahi Dekha (1957), Ujala and Dil Dil Deke Deko (both 1959). In the first half of the 1960s, Kapoor was seen in successful films like College Girl, Basant, Singapore, Boy Friend, Professor, Dil Tera Diwana, Vallah Kya Baat Hai, Pyar Kiya To Darna Kya, China Town, Kashmir Ki Kali, Bluff Master, Janwar and Rajkumar. In 1968, he received the first Filmfare Best Actor award of his career for the film Bramhachari. He made a unique place for himself in the industry as he was the only dancing hero in Hindi films from the late fifties till early seventies. He used to compose dancing steps by himself in the songs picturised on him, and reportedly never needed a choreographer. This earned him the name of Elvis Presley of India.

His pairing opposite Southern heroines tended to be commercially successful. He played opposite B. Saroja Devi in Pyaar Kiya To Darna Kya and Preet Na Jane Reet, with Padmini in Singapore (1960 film), and opposite Vyjayanthimala in College Girl and Prince (1969 film).[12] In the late sixties, his successful films included Budtameez and Sachaai with Sadhana, Latt Saheb with Nutan and Tumse Achha Kaun Hai with Babita.

In the 1970s, Kapoor’s weight problem proved an obstacle when playing the romantic hero, and the last such film he played in was Andaz (1971). He would later move to character roles and acted in films like Zameer, Hero, Vidhaata, Hukumat, Batwara, Tahalka, Chamatkar, Namak and Prem Granth. In 1974, he directed Manoranjan and in 1976 Bundal Baaz.

Shammi turned into a successful supporting actor in the 1970s, playing Saira Banu's father in Zameer (1974), when he had been her leading man a decade earlier in Junglee (1961) and Bluff Master (1964) and playing Amitabh Bachchan's foster father in Parvarish. He also directed Manoranjan (1974), a movie inspired from Irma La Douce and in which he played a supporting role himself and Bundal Baaz (1976) starring Rajesh Khanna, but neither were successful commercially though got critical acclaims and were hailed as classics and to be ahead of its time. In the 1980s and 1990s, he continued to play supporting roles in many films and won a Filmfare Best Supporting Actor Award for his performance in Vidhaata (1982). He got the opportunity to do some films in other languages such as Bengali and Tamil in the nineties. 

He did a social melodrama serial called Chattan aired on Zee TV for more than a year in the 1990s. He eventually cut down on film appearances by the late 1990s and early 2000s and made his appearances
in the 1999 Salman Khan and Urmila Matondkar starrer Jaanam Samjha Karo, 2002 release Waah! Tera Kya Kehna and the delayed 2006 release Sandwich. His last appearance as a character actor was in the delayed 2006 film, Sandwich. He made his last appearance in Imtiaz Ali's directorial venture Rockstar co-starring his grand-nephew Ranbir Kapoor, the grandson of his brother Raj Kapoor.
Film director Shakti Samanta directed Shammi Kapoor in six hit films like Singapore, Pagla Kahin Ka, China Town, Kashmir Ki Kali, AnEvening In Paris and Jaane Anjane and quoted in an interview “I foundShammi to be a thoroughly good man. Even in his heydays, he was humble.

Shammi Kapoor was the founder and chairman of Internet Users Community of India (IUCI). He had also played a major role in setting up internet organizations like the Ethical Hackers Association. Kapoor also maintained a website dedicated to the Kapoor family.

Awards
• 1968 – Filmfare Best Actor Award for Brahmachari
• 1982 – Filmfare Best Supporting Actor Award for Vidhata[
• 1995 –Filmfare Lifetime Achievement Award
IIFA Awards
• 2002 – Invaluable Contribution To Indian Cinema at the IIFA
Bollywood Movie Awards
• 2005 – Lifetime Achievement Award[25]
Zee Cine Awards
• 1999 – Zee Cine Award for Lifetime Achievement
Star Screen Awards
• 2001 – Star Screen Lifetime Achievement Award
Other Awards
• 1998 – Kalakar Awards – Special Award for "contribution in Indian Cinema"
• 2001 – Anandalok Awards Lifetime Achievement Award
• Living Legend Award by the Federation of Indian Chamber of Commerce
and Industry (FICCI
• 2008 – Lifetime Achievement Award for his contribution to Indian
cinema at the Pune International Film Festival (PIFF).
• Rashtriya Gaurav Award
He even won the most prestigious Dada Saheb Falke Award for his marvelous film career in Indian Cinema. He left us on 7 August 2011, actually he was suffering from chronic renal failure. But he is still in the memory of millions of music lovers.

आज भी शम्मी जी शारीरिक रूप से तो हमारे बीच नहीं रहे परन्तु उनकी फ़िल्में तथा उन पर फिल्माए गीत के बोल सुनकर ऐसा अहसास होता है कि वे यहीं कहीं हैं. जरा निम्न गाने के बोल पर गौर फरमाएँ:

एहसान तेरा होगा मुझ पर दिल कहता वो कहने दो
मुझे तुमसे मोहब्बत हो गई है, मुझे पलकों की छावं में रहने दो
चाहे बना दो चाहे मिटा दो, मर भी गए तो देंगे दुआएं

Courtesy:
S.S.Dogra-Journalist
(Managing Editor- www.dwarkaparichay.com)
M:9811369585


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